Wednesday, December 24, 2014

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के चुम्बकीय भाषण

अटल बिहारी वाजपेयी जी का ओजस्वी भाषण और गम्भीर लेखन अपना
Atal Bihari Vajpayee Quotes Speech in Hindi
Shree Atal Bihari Vajpayee
एक विशेष स्थान रखता है। उनकी एक आवाज पर सभी कार्यकर्ता एक जुट होकर देशहित के लिये कार्य करने के लिये तद्पर रहते थे। उनके भाषण किसी चुम्बक के समान हैं, जिसको सुनने के लिये लोगों का हुजूम बरबस ही उनकी तरफ खिंचा आता था।  विरोधी पक्ष भी अटल जी के धारा प्रवाह और तेजस्वी भाषण का कायल रहा है। अटल जी के भाषण, शालीनता और शब्दों की गरिमा का अद्भुत मिश्रण है। उनकी वाणी में ऐसी मोहनी है कि, लोग उनका प्रसन्नता पूवर्क अनुगमन करने लगते हैं।  जब सदन में अंग्रेजी छायी रहती थी तब अादरणीय अटल जी की धारा प्रवाह प्रांजल भाषा सबको पसंद आती थी। जब अटल जी बोलते थे तो नेहरु जी भी उनके भाषण को बहुत ध्यान से सुनते थे। प्रारंभ से ही अटल जी के भाषण की सभी सांसद प्रशंसा करते थे। अटल जी के भाषणों में विद्यमान काव्यात्मक शैली और तर्कपूर्ण विवेचन ने सभी को आकृष्ट किया है । यह लेख अटल जी के कुछ ऐसे ही प्रभावशील भाषणों के मनकों को एक माला में पिरोने का प्रयास है…………
भारत और नेपाल के बीच उत्पन्न मनोमानिल्य को दूर करते हुए अटल जी ने  अपने भाषण में संवेदना पूर्ण स्वर में कहा था कि,
‘दुनिया में कोई देश इतना निकट नही हो सकते जितने की भारत और नेपाल हैं। इतिहास ने, भूगोल ने, संस्कृति ने, धर्म ने, नदियों ने हमें आपस में बाँधा है।’
सांसद के रूप में अटल जी आरंभ से ही अपने भाषणों की तैयारी बङी गंभीरता के साथ करते थे। उन्होने सदन में कभी भी एक शब्द अनर्गल नही कहा। 23 मार्च 1992 को लोकसभा में उनके विचार पूर्ण और तर्क संगत भाषण को देश के सभी हिस्सों में सराहा गया। बेरोजगारी का जिक्र करते हुए अटल जी ने कहा कि, बढती हुई बेरोजगारी का क्या होगा, रोजगार देने में छोटे उद्योग अहम भूमिका अदा करते हैं किन्तु वे भी बीमार हो रहे हैं। लाखों छोटे उद्योग बंद हैं। कोई उनकी चिंता करने वाला नही है। उसमें कई लोगों की पूंजी फंसी है और उसमें काम करने वालों को दूसरी जगह रोजगार नही मिल रहा।
डॉ.राजेन्द्र प्रसाद व्याख्यान माला के अन्तर्गत, आकाशवाणी द्वारा आयोजित 2 और 3 दिसंबर को अटल जी द्वारा दिये एक लंबे व्यकतव्य में धर्म और रिलिजन के संबन्ध में अटल जी ने अपनी महत्वपूर्ण राय रखी थी। जो की आज के परिपेक्ष्य में अति प्रासंगिक है। अटल जी ने कहा था कि,
“यद्यपि धर्म का अर्थ बहुधा वही समझा जाता है जो, रिलिजन (Religion)  का मतलब है परंतु वास्तव में धर्म का अर्थ भारतीय चिंतन में अधिक व्यापक और अनेक अर्थों में हुआ है। धर्म शब्द के मूल में ध्रू धातु का संबंध धारण करने से है। अतः ये कहा जा सकता है कि, जो जिसका वास्तविक रूप है उसे बनाये रखने और उस पर बल देने में जो सहायक हो वही उसका धर्म है। धर्म और रिलिजन के अंतर को हमें समझना चाहिये। रिलिजन (Religion) का संबंध कुछ निश्चित आस्थाओं से होता है, जब तक व्यक्ति उनको मानता है, वह उस रिलिजन (Religion), उस मज़हब का सदस्य बना रहता है। जैसे ही वह उन आस्थाओं को छोङता है, वह उस रिलिजन से बहिष्कृत हो जाता है।धर्म केवल आस्थाओं पर आधारित नही है। किसी धार्मिक आस्था में विश्वास न रखने वाला व्यक्ति भी धार्मिक अर्थात सदगुंणी हो सकता है। धर्म वस्तुतः जीने का तरीका है। वह आस्थाओं से अधिक जीने की प्रक्रिया पर आधारित है। धर्म के साथ विशेषण जोङने की परिपाटी नही है। धर्म न देश से बंधा है न काल से और न वे किसी सम्प्रदाय विशेष से जुङा है। धर्म जब किसी सम्प्रदाय विशेष से जुङता है तब वह रिलिजन का रूप ग्रहण कर लेता है।धर्म जब संस्थागत धर्म बन जाता है तब वह रिलिजन(Religion)  हो जाता है। शत्पल ब्राह्मण में कहा गया है कि, धर्म शासक का भी शासक है तथा धर्म में प्रभु सत्ता निहीत है। महाभारत में भी इसका प्रमाण मिलता है कि, शासक धर्म के अधीन रहता है।”
अटल जी को 17 अगस्त 1994 को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया।  उस अवसर पर अटल जी ने अपने भाषण में कहा था कि,”मैं अपनी सीमाओं से परिचित हुँ , मुझे अपनी कमियों का एहसास है। निर्णायकों ने अवश्य ही मेरी न्यूनताओं को नजर अंदाज करके मुझे निर्वाचित किया है। सद्भाव में अभाव दिखाई नही देता।  यह देश बङा अद्भुत है और अनुठा है। किसी भी पत्थर को सिंन्दूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है, अभिनंदन किया जा सकता है। लोकतंत्र 51 और 49 का खेल नही है, लोकतंत्र मूल रूप से एक नैतिक व्यवस्था है। संविधान और कानून सबका अपना महत्व है लेकिन लोकतंत्र एक ढांचा मात्र बनकर रह जाए, एक कर्मकांड में बदल जाये, उसकी प्राण शक्ति घटती जाये तो वहाँ कठिनाई पैदा हो जाती है। उस प्राण शक्ति को घटने न देना, हम सबकी जिम्मेदारी है। मैं आप सबको ह्रदय से धन्यवाद देता हुँ। मैं प्रयत्न करुंगा कि इस सम्मान के लायक अपने आचरण को बनाये रख सकुं। जब कभी मेरे पैर डगमगायें तब ये सम्मान मुझे चेतावनी देता रहे कि इस रास्ते पर डांवाडोल होने की गलती नही कर सकते। बहुत-बहुत धन्यवाद।”
अटल जी लोकतंत्र के प्रहरी हैं जब कभी लोकतंत्र की मर्यादा पर आँच आई तो अटल जी ने उसका डंटकर मुकाबला किया। लोकतंत्र के विषय में उनके विचार स्पष्ट है। वे कहते हैं, भारत संसार का सबसे बङा लोकतंत्र है 1975 और 1976 के छोटे से कालखंड को छोङकर लोकतंत्र की व्यवस्था अक्षुणं रही। बालिग मताधिकार, निश्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र न्याया पालिका, बहुदलिय पद्धति तथा स्वतंत्र प्रेस हमारे लोकतंत्र के आधार हैं। यहाँ लोग चुनाव के माध्यम से सरकार बदलते हैं।
लखनऊ संसदीय  क्षेत्र के महुना ग्रामीण अंचल में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए अटल जी ने कहा था कि,
हमारे देश में गॉव उपेक्षित है। उनकी फिक्र करने वाले दिल्ली नही छोङते वहीं बैठे-बैठे सिर्फ चिन्ता करते हैं। गॉव में यदि कुँए न हो तो लोग प्यास से मर जाएं। हमारे यहाँ कुएँ भगवान हैं। मैने अपने क्षेत्र में हैडपंप लगवाए, पर पता चला कि वे गरमी में पानी नही देते। अपने मजाकिया अंदाज में अटल जी कहते हैं कि,लोग कहते हैं कि ये अटल जी के हैंडपंप हैं। अटल जी ने कहा कि, अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच सांठ-गाँठ हो गई, घोटाला हुआ, जहाँ देखो वहाँ घोटाला ही घोटाला। ये देश घोटालों मे पूरी तरह से डुबा हुआ है। जनता के प्रतिनिधी जनता का कुछ भी ध्यान नही रखते। वे केवल अपने और अपने परिवार तक ही सिमित हो गये हैं।
अपने भाषणों के सम्बंध में अटल जी कहते हैं कि मेरे भाषणों में मेरा लेखक मन बोलता है लेकिन राजनेता भी चुप नही रहता। राजनेता लेखक के समक्ष अपने विचार रखता है और लेखक पुनः उन विचारों को पैनी अभिव्यक्ति देने का प्रयास करता है। मै तो मानता हूँ कि मेरे राजनेता और मेरे लेखक का परस्पर सम्मनव्यय ही मेरे भाषण में दिखाई देता है। मेरा लेखक राजनेता को मर्यादा का उल्घंन नही करने देता। अटल जी सदैव दल से ऊपर उठकर देशहित के बारे में सोचते, लिखते और बोलते हैं। पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर जब अटल जी जब अपने संसदीय क्षेत्र लखनऊ गये तो वहाँ की जनता को सम्धित करते हुए उन्होने कहा था कि,
“कोई अपने घर में मेहमान नही होता, चुनाव में मै आपका उम्मीदवार था। आप लोगों ने मुझे सेवा का अवसर दिया, आप लोगों के प्रति आभार प्रकट करने के लिये मैं यहाँ आया हुँ। आप लोगों ने मुझे एम पी बनाया और दिल्ली पहुँचकर पी एम बन गया। लखनऊ से मेरा बहुत पुराना नाता है। मैं 1946 में यहाँ एक मासिक पत्रिका के सम्पादक के रूप में आया था। मैं चाहता था कि उन पुरानी गलियों में फिर से जाऊँ किन्तु सुरक्षा कारणों से ऐसा नही हो सकता। हम एकता में विश्वास करते हैं, एक रूपता में नही। हमारा देश दुनिया में अनुठा है। भाईचारे की अद्भुत मिसाल वाला ये देश अनुठा बना रहेगा। कोई हमें सेक्युलरवाद पढाये इसकी हमें जरुरत नही। सेक्युलरवाद तो हमारी सांस-सांस में है। यहाँ सभी को अपने मजहब के अनुसार पूजा अर्चना का संवैधानिक अधिकार है। हम देश को सर्वधर्म समभाव की दिशा में ले कर चलें। हमें राष्ट्र निर्माण का अवसर मिला है, देश की जनता पर हमें भरोसा है। हम आश्वासन देते हैं कि हमारे प्रयत्नों में कोई कमी न होगी। सबको मिलकर राष्ट्र निर्माण का काम करना होगा। राजनीति से ऊपर उठकर सबको लगना होगा। आपने स्वागत करके मुझे और अधिक कार्यरत करने की क्षमता प्रदान की है। आप सबके स्नेह और सहयोग के लिये धन्यवाद।”
आदरणीय अटल जी के और भी कई महत्वपूर्ण भाषण हैं परंतु आज की माला भारत के गुणगान के साथ पूर्ण करते हैं। अटल जी को अपने भारत पर बहुत गर्व है एक अवसर पर उन्होने कहा था कि,
“भारत ज़मीन का टुकङा नही है, जीता-जागता राष्ट्र पुरुष है। हिमालय इसका मस्तक है, गौरी शंकर शिखा है। कश्मीर किरिट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं। विनध्याचल कटि है, नर्मदा करधनी है। पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जँघाए हैं। कन्याकुमारी उसके चरण हैं, सागर उसके चरण पखारता है। पावस के काले-काले मेघ इसके कुंतल केश हैं। चाँद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं। यह वंदन की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है। यह तर्पण की भूमि है। इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है। हम जियेगें तो इसके लिये और मरेंगे तो इसके लिये।”
मित्रों, ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, पुरे विश्व में अटल जी एक श्रेष्ठ वक्ता के रूप में अपनी छाप छोङने में सफल रहे हैं। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने देश और अपने देशवासियों पर गर्व करने वाले आदरणीय अटल जी  का हम उनके जन्मदिवस पर शत् शत् नमन और अभिनन्दन करते हैं।
वंदे मातरम
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